ग़ज़ल

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त! घबराता हूँ मैं

जिगर मुरादाबादी · सब कलाम देखें
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त! घबराता हूँ मैं।जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं॥
कू-ए-जानाँ की हवा तक से भी थर्राता हूँ मैं।क्या करूँ बेअख़्तयाराना चला जाता हूँ मैं॥
मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम, मेरी फ़ितरत इज़्तराब।कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं॥
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh