ग़ज़ल
आदमी आदमी से मिलता है
आदमी आदमी से मिलता हैदिल मगर कम किसी से मिलता है
भूल जाता हूँ मैं सितम उस केवो कुछ इस सादगी से मिलता है
आज क्या बात है के फूलों कारंग तेरी हँसी से मिलता है
मिल के भी जो कभी नहीं मिलताटूट कर दिल उसी से मिलता है
कार-ओ-बार-ए-जहाँ सँवरते हैंहोश जब बेख़ुदी से मिलता है
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