ग़ज़ल
दिल को मिटा के दाग़े-तमन्ना दिया मुझे
दिल को मिटा के दाग़े-तमन्ना दिया मुझेऐ इश्क़ तेरी ख़ैर हो ये क्या दिया मुझे
महशर में बात भी न ज़बाँ से निकल सकीक्या झुक के उस निगाह ने समझा दिया मुझे
मैं और आरज़ू-ए-विसाले-परी-रुख़ाँइस इश्क़े-सादा-लौह ने भटका दिया मुझे
हर बार यास हिज्र में दिल की हुई शरीकहर मर्तबा उम्मीद ने धोका दिया मुझे
दावा किया था ज़ब्ते-मोहब्बत का ऐ ‘जिगर’ज़ालिम ने बात-बात पे तड़पा दिया मुझे
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