ग़ज़ल
आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था
आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर थाआया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था
वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर थाआता न था नज़र को नज़र का क़ुसूर था
कोई तो दर्दमंदे-दिले-नासुबूर थामाना कि तुम न थे, कोई तुम-सा ज़रूर था
लगते ही ठेस टूट गया साज़े-आरज़ूमिलते ही आँख शीशा-ए-दिल चूर-चूर था
ऐसा कहाँ बहार में रंगीनियों का जोशशामिल किसी का ख़ूने-तमन्ना ज़रूर था
साक़ी की चश्मे-मस्त का क्या कीजिए बयानइतना सुरूर था कि मुझे भी सुरूर था
जिस दिल को तुमने लुत्फ़ से अपना बना लियाउस दिल में इक छुपा हुआ नश्तर ज़रूर था
देखा था कल ‘जिगर’ को सरे-राहे-मैकदाइस दर्ज़ा पी गया था कि नश्शे में चूर था
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