ग़ज़ल
तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुई
तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुईवो ज़िंदगी तो मुहब्बत की ज़िंदगी न हुई!
कोई बढ़े न बढ़े हम तो जान देते हैंफिर ऐसी चश्म-ए-तवज्जोह कभी हुई न हुई!
तमाम हर्फ़-ओ-हिकायत तमाम दीदा-ओ-दिलइस एह्तेमाम पे भी शरह-ए-आशिकी न हुई
सबा यह उन से हमारा पयाम कह देनागए हो जब से यहां सुबह-ओ-शाम ही न हुई
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरीकि हमने आह तो की उनसे आह भी न हुई
ख़्याल-ए-यार सलामत तुझे खुदा रखेतेरे बगैर कभी घर में रोशनी न हुई
गए थे हम भी जिगर जलवा-गाह-ए-जानां मेंवो पूछते ही रहे हमसे बात ही न हुई
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