ग़ज़ल

कभी शाख़-ओ-सब्ज़-ओ-बर्ग पर

जिगर मुरादाबादी · सब कलाम देखें
कभी शाख़-ओ-सब्ज़-ओ-बर्ग पर कभी ग़ुँचा-ओ-गुल-ओ-ख़ार परमैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ मेरा हक़ है फ़सल-ए-बहार परमुझे दे न ग़ैब में धमकियाँ गिरे लाख बार ये बिजलियाँमेरी सर-तलक यही आशियाँ मेरी मिल्कीयत यही प्यार हैमेरी सिम्त से उसे ऐ सबा ये पयाम-ए-आख़िर-ए-ग़म सुनाअभी देखना हो तो देख जा के ख़िज़ाँ है अपनी बहार पेये फ़रेब-ए-जल्वा-ए-सर-बसर मुझे डर है ये दिल-ए-बेख़बरकहीं जम न जाये तेरी नज़र इन्हीं चंद नक़्श-ओ-निगार परअजब इंक़लाब-ए-ज़माना है मेरा मुख़्तसर सा फ़साना हैये जो आज बार है दोश पर यही सर था ज़ानो-ए-यार परमैं रहीन-ए-दर्द सही मगर मुझे और क्या चाहिये "ज़िगर"ग़म-ए-यार है मेरा शेफ़ता मैं फ़रेफ़ता ग़म-ए-यार पर
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