ग़ज़ल

कहाँ से बढ़कर पहुँचे हैं

जिगर मुरादाबादी · सब कलाम देखें
कहाँ से बढ़कर पहुँचे हैं कहाँ तक इल्म-ओ-फ़न साक़ीमगर आसूदा इनसाँ का न तन साक़ी न मन साक़ी
ये सुनता हूँ कि प्यासी है बहुत ख़ाक-ए-वतन साक़ीख़ुदा हाफ़िज़ चला मैं बाँधकर सर से कफ़न साक़ी
सलामत तू तेरा मयख़ाना तेरी अंजुमन साक़ीमुझे करनी है अब कुछ खि़दमत-ए-दार-ओ-रसन साक़ी
रग-ओ-पै में कभी सेहबा ही सेहबा रक़्स करती थीमगर अब ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी है मोजज़न साक़ी
न ला विश्वास दिल में जो हैं तेरे देखने वालेसरे मक़तल भी देखेंगे चमन अन्दर चमन साक़ी
तेरे जोशे रक़ाबत का तक़ाज़ा कुछ भी हो लेकिनमुझे लाज़िम नहीं है तर्क-ए-मनसब दफ़अतन साक़ी
अभी नाक़िस है मयआर-ए-जुनु, तनज़ीम-ए-मयख़ानाअभी नामोतबर है तेरे मसतों का चलन साक़ी
वही इनसाँ जिसे सरताज-ए-मख़लूक़ात होना थावही अब सी रहा है अपनी अज़मत का कफ़न साक़ी
लिबास-ए-हुर्रियत के उड़ रहे हैं हर तरफ़ पुरज़ेलिबास-ए-आदमीयत है शिकन अन्दर शिकन साक़ी
मुझे डर है कि इस नापाकतर दौर-ए-सियासत मेंबिगड़ जाएँ न खुद मेरा मज़ाक़-ए-शेर-ओ-फ़न साक़ी
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