ग़ज़ल
इश्क़ फ़ना का नाम है इश्क़ में ज़िन्दगी न देख
इश्क़ फ़ना का नाम है इश्क़ में ज़िन्दगी न देखजल्वा-ए-आफ़्ताब बन ज़र्रे में रोशनी न देख
शौक़ को रहनुमा बना जो हो चुका कभी न देखआग दबी हुई निकाल आग बुझी हुई न देख
तुझको ख़ुदा का वास्ता तू मेरी ज़िन्दगी न देखजिसकी सहर भी शाम हो उसकी सियाह शबी न देख
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