ग़ज़ल
तुम कनक किरन
तुम कनक किरन के अंतराल मेंलुक छिप कर चलते हो क्यों ?
नत मस्तक गवर् वहन करतेयौवन के घन रस कन झरतेहे लाज भरे सौंदर्य बता दोमोन बने रहते हो क्यो?
अधरों के मधुर कगारों मेंकल कल ध्वनि की गुंजारों मेंमधु सरिता सी यह हंसी तरलअपनी पीते रहते हो क्यों?
बेला विभ्रम की बीत चलीरजनीगंधा की कली खिलीअब सांध्य मलय आकुलित दुकूलकलित हो यों छिपते हो क्यों?
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