ग़ज़ल
जगजीत: एक बौछार था वो...
एक बौछार था वो शख्स,::बिना बरसे किसी अब्र की सहमी सी नमी से:::जो भिगो देता था...::एक बोछार ही था वो,::जो कभी धूप की अफशां भर के::दूर तक, सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था::नीम तारीक से हॉल में आंखें चमक उठती थीं
::सर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह,::लगता था झोंका हवा का था कोई छेड़ गया है::गुनगुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह::मुस्कराहट में कई तरबों की झनकार छुपी थी::गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनकार था वो::एक आवाज़ की बौछार था वो!!
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