ग़ज़ल
अफ़साने
खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने मेंएक पुराना खत खोला अनजाने में
जाना किसका ज़िक्र है इस अफ़साने मेंदर्द मज़े लेता है जो दुहराने में
शाम के साये बालिस्तों से नापे हैंचाँद ने कितनी देर लगा दी आने में
रात गुज़रते शायद थोड़ा वक्त लगेज़रा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में
दिल पर दस्तक देने ये कौन आया हैकिसकी आहट सुनता है वीराने मे ।
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