ग़ज़ल

इक इमारत

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इक इमारतहै सराय शायद,जो मेरे सर में बसी है.सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए जूतों की धमक,बजती है सर मेंकोनों-खुदरों में खड़े लोगों की सरगोशियाँ,सुनता हूँ कभीसाज़िशें, पहने हुए काले लबादे सर तक,उड़ती हैं, भूतिया महलों में उड़ा करती हैंचमगादड़ें जैसेइक महल है शायद!साज़ के तार चटख़ते हैं नसों मेंकोई खोल के आँखें,पत्तियाँ पलकों की झपकाके बुलाता है किसी को!चूल्हे जलते हैं तो महकी हुई 'गन्दुम' के धुएँ में,खिड़कियाँ खोल के कुछ चेहरे मुझे देखते हैं!और सुनते हैं जो मैं सोचता हूँ !एक, मिट्टी का घर हैइक गली है, जो फ़क़त घूमती ही रहती हैशहर है कोई, मेरे सर में बसा है शायद!
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