ग़ज़ल
खुमानी, अखरोट!
ख़ुमानी, अख़रोट बहुत दिन पास रहे थेदोनों के जब अक़्स पड़ा करते थे बहते दरिया में,पेड़ों की पोशाकें छोड़के,नंग-धड़ंग दोनों दिन भर पानी में तैरा करते थेकभी-कभी तो पार का छोर भी छू आते थे
ख़ुमानी मोटी थी और अख़रोट का क़द कुछ ऊँचा थाभँवर कोई पीछे पड़ जाए, तो पत्थर की आड़ से होकर,अख़रोट का हाथ पकड़ के वापस भाग आती थी।
अख़रोट बहुत समझाता था,"देख ख़ुमानी, भँवर के चक्कर में मत पड़ना,पाँव तले की मिट्टी खेंच लिया करता है।"
इक शाम बहुत पानी आया तुग़यानी का,और एक भँवर...ख़ुमानी को पाँव से उठाकर, तुग़यानी में कूद गया।
अख़रोट अब भी उस जानिब देखा करता है,जिस जानिब दरिया बहता है।अख़रोट का क़द कुछ सहम गया हैउसका अक़्स नहीं पड़ता अब पानी में!
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