ग़ज़ल
आम
मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ
जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिएपरली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसकेजाने दुखती हुई किस शाख से मेरा पाँव लगाधाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसनेमैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर
मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकरमेरी वेदी का हवन गरम किया था उसनेऔर जब हामला थी बीबा, तो दोपहर में हर दिनमेरी बीवी की तरफ़ कैरियाँ फेंकी थी उसी ने
वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी लजाता था जब मुन्ने से कहती बीबा'हाँ उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है।'
अब भी लजाता हूँ, जब मोड़ से गुज़रता हूँखाँस कर कहता है,"क्यूँ, सर के सभी बाल गए?"
सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वालेमोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको!
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