ग़ज़ल
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी हैअभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैंअभी तो किरदार ही बुझे हैं।अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल केअभी तो एहसास जी रहा है।
यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी हैयह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकरयहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकरकहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगेअभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
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