ग़ज़ल

टैगोर

गुलज़ार · सब कलाम देखें
एक देहाती सर पे गुड की भेली बांधे,लम्बे- चौडे एक मैदा से गुज़र रहा थागुड की खुशबु सुनके भिन-भिन करतीएक छतरी सर पे मंडलाती थीधूप चढ़ती और सूरज की गर्मी पहुची तोगुड की भेली बहने लगी
मासूम देहाती हैरा थामाथे से मीठे-मीठे कतरे गिरते थेऔर वो जीभ से चाट रहा था!
मै देहाती.........मेरे सर पर ये टैगोर की कविता की भेली किसने रख दी!
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