ग़ज़ल

खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?

गुलज़ार · सब कलाम देखें
खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।
डाक से आया है तो कुछ कहा होगा"कोई वादा नहीं... लेकिनदेखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"
या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैं:::अब तुम्हें देने को बचा क्या है?"
सामने रख के देखते हो जबसर पे लहराता शाख का सायाहाथ हिलाता है जाने क्यों?कह रहा हो शायद वो..."धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!"
सामने रौशनी के रख के देखो तोसूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं
"इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायदशहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!"
उसने भी वक्त के हवाले सेउसमें कोई इशारा रखा हो... याउसने शायद तुम्हारा खत पाकरसिर्फ इतना कहा कि, ''लाजवाब हूँ मैं!''
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