ग़ज़ल

रहिये लटपट काटि दिन

गिरिधर कविराय · सब कलाम देखें
रहिये लटपट काटि दिन, बरु घामें मां सोय।छांह न वाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय॥
जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा दैहै।जा दिन बहै बयारि, टूटि तब जर से जैहै॥
कह 'गिरिधर कविराय छांह मोटे की गहिये।पाता सब झरि जाय तऊ छाया में रहिये॥
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