ग़ज़ल
कमरी थोरे दाम की
कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥
उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥
कह 'गिरिधर कविराय', मिलत है थोरे दमरी।सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥
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