ग़ज़ल

क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में नमनाक हैं पलकेंक्यों याद तेरी आते ही तारे निकल आए
बरसात की इस रात में ऐ दोस्त तेरी यादइक तेज़ छुरी है जो उतरती चली जाए
कुछ ऐसी भी गुज़री हैं तेरे हिज्र में रातेंदिल दर्द से ख़ाली हो मगर नींद न आए
शायर हैं फ़िराक़ आप बड़े पाए के लेकिनरक्खा है अजब नाम, कि जो रास न आए
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