ग़ज़ल

ग़ैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैंआप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं
वाकई तेरे इस अन्दाज को क्या कहते हैंना वफ़ा कहते हैं जिस को ना ज़फ़ा कहते हैं
हो जिन्हे शक, वो करें और खुदाओं की तलाशहम तो इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं
तेरी सूरत नजर आई तेरी सूरत से अलगहुस्न को अहल-ए-नजर हुस्न नुमां कहते हैं
शिकवा-ए-हिज़्र करें भी तो करें किस दिल सेहम खुद अपने को भी अपने से जुदा कहते हैं
तेरी रूदाद-ए-सितम का है बयान नामुमकिनफायदा क्या है मगर यूं जो जरा कहते हैं
लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी कोहम तो इन बातों अच्छा ना बुरा कहते हैं
औरों का तजुरबा जो कुछ हो मगर हम तो फ़िराकतल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं
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