ग़ज़ल
ऐ जज्बा-ए-निहां और कोई है कि वही है
ए ज़ज़्बे निहां और कोई है कि वही हैखिलवत कदा ए दिल में आवाज हुई है
कह दे जरा सर तेरे दामन में छुपा लूंऔर यूं तो मुकद्दर में मेरे बेवतनी है
वो रंग हो या बू हो कि बाद ए सहरी होए बाग ए जहां जो भी यहां है, सफ़री है
ये बारिश ए अनवर, ये रंगीनी ए गुफ़्तारगुल बारी ओ गुल सैरी ओ गुल पैरहानी है
ए ज़िन्दगी ए इश्क में समझा नहीं तझकोजन्नत भी, जहन्नुम भी, ये क्या बूलजबी है
है नुत्क जिसे चूमने के वास्ते बेताबसौ बात की एक बात तेरी बे-सखुनी है
मौजे हैं मय ए सुर्ख की या खते ए दाहन हैलब है की शोला ए बर्क ए अम्बी है
जागे हैं फ़िराक आज गम ए हिज़्रा में ता सुबहआहिस्ता से आ जाओ अभी आंख लगी है.
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