ग़ज़ल
जो बात है हद से बढ़ गयी है
जो बात है हद से बढ़ गयी हैवाएज़ के भी कितनी चढ़ गई है
हम तो ये कहेंगे तेरी शोख़ीदबने से कुछ और बढ़ गई है
हर शय ब-नसीमे-लम्से-नाज़ुकबर्गे-गुले-तर से बढ़ गयी है
जब-जब वो नज़र उठी मेरे सरलाखों इल्ज़ाम मढ़ गयी है
तुझ पर जो पड़ी है इत्तफ़ाक़नहर आँख दुरूद पढ़ गयी है
सुनते हैं कि पेंचो-ख़म निकल करउस ज़ुल्फ़ की रात बढ़ गयी है
जब-जब आया है नाम मेराउसकी तेवरी-सी चढ़ गयी है
अब मुफ़्त न देंगे दिल हम अपनाहर चीज़ की क़द्र बढ़ गयी है
जब मुझसे मिली 'फ़िराक' वो आँखहर बार इक बात गढ़ गयी है
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