ग़ज़ल

कर गई कम वो नज़र

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
कर गई काम वो नज़र, गो उसे आज देखकर.दर्द भी उठ सका नहीं,रंग भी उड़ सका नहीं.
तेरी कशीदगी में आज शाने-सुपुर्दगी भी है.हुस्न के वश में क्या है और,इश्क़ के वश में क्या नहीं.
इससे तो कुफ्र ही भला, जो है इसी जहान का.ऐसे खुदा से क्या जिसे फुर्सते-मासिवा नहीं.
वो कोई वारदात है, जिसको कहें कि हो गई.दर्द उसी का नाम है जो शबे-ग़म उठा नहीं.
याद तो आये जा कि फ़िर,होश उड़ाये जा कि फ़िर.छाने की ये घटा नहीं,चलने की ये हवा नहीं.
देख लिया वहाँ तुझे,दीदा-ए-एतबार ने.हाथ को हाथ भी जहाँ,सुनते हैं सूझता नहीं.
कौलो-क़रार भी तेरे ख़्वाबो-ख़याल हो गये.वो न कहा था हुस्न ने इश्क़ को भूलता नहीं.
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