ग़ज़ल

उमीदे-मर्ग कब तक

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
उमीदे-मर्ग कब तक ज़ि‍न्दगी का दर्दे-सर कब तकये माना सब्र करते हैं महब्बत में मगर कब तक
दयारे दोस्त हद होती है यूँ भी दिल बहलने कीन याद आयें ग़रीबों को तेरे दीवारो-दर कब तक
यूँ तदबीरें भी तक़दीरे- महब्बत बन नहीं सकतींकिसी को हिज्र में भूलें रहेंगे हम मगर कब तक
इनायत की करम की लुत्फ़ की आख़ि‍र कोई हद हैकोई करता रहेगा चारा-ए-जख्‍़मे ज़िगर कब तक
किसी का हुस्न रुसवा हो गया पर्दे ही पर्दे मेंन लाये रंग आख़िरकार ता‍सीरे-नज़र कब तक
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