ग़ज़ल

उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगीइक नागन-सी लहराने लगी
जब ज़ि‍क्र तेरा महफ़ि‍ल में छिड़ाक्यों आँख तेरी शरमाने लगी
क्या मौजे-सबा थी मेरी नज़रक्यों ज़ुल्फ़ तेरी बल खाने लगी
महफ़ि‍ल में तेरी एक-एक अदाकुछ साग़र-सी छलकाने लगी
या रब याँ चल गयी कैसी हवाक्यों दिल की कली मुरझाने लगी
शामे-वादा कुछ रात गयेतारों को तेरी याद आने लगी
साज़ों ने आँखे झपकायींनग़्मों को मेरे नींद आने लगी
जब राहे-ज़ि‍न्दगी काट चुकेहर मंज़ि‍ल की याद आने लगी
क्या उन जु़ल्फ़ों को देख लियाक्यों मौजे-सबा थर्राने लगी
तारे टूटे या आँख कोईअश्कों से गुहर बरसाने लगी
तहज़ीब उड़ी है धुआँ बन करसदियों की सई ठिकाने लगी
कूचा-कूचा रफ़्ता-रफ़्तावो चाल क़यामत ढाने लगी
क्या बात हुई ये आँख तेरीक्यों लाखों क़समें खाने लगी
अब मेरी निगाहे-शौक़ तेरेरुख़सारों के फूल खिलाने लगी
फि‍र रात गये बज़्मे-अंजुमरूदाद तेरी दोहराने लगी
फि‍र याद तेरी हर सीने केगुलज़ारों को महकाने लगी
बेगोरो-क़फ़न जंगल में ये लाशदीवाने की ख़ाक उड़ाने लगी
वो सुब्ह‍ की देवी ज़ेरे-शफ़क़घूँघट-सी ज़रा सरकाने लगी
उस वक्त 'फ़ि‍राक' हुई ये ग़ज़लजब तारों को नींद आने लगी
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh