ग़ज़ल
कुछ अशआर
संग-ओ-आहन बेनियाज़-ए-ग़म नहींदेख हर दीवार-ओ-दर से सिर न मार
निगह-ए-यास किसी मस्त की क्यों न आए यादसाक़िया आह वही रूह थी मयख़ाने की
ज़िन्दगी में दिल-ए-बर्बाद के हो ले बेचैनफिर हवा-ए-चमन ए इश्क़ नहीं आने की
क्या है ये सिलसिला-ए-हस्ती ए पेचीदा-ए-दहरएक उतरी हुई ज़ंजीर है दीवाने की
अब किसे हस्ती कहिए किसे नेस्ती कहिएज़िन्दगी मुझको क़सम दे गई मर जाने की
दामन-ए-अब्र में क्या बर्क़ का छुपना देखेंहमने देखी हैं अदाएँ तेरे शर्माने की
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