ग़ज़ल

कभी जब तेरी याद आ जाये है

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
कभी जब तेरी याद आ जाये हैदिलों पर घटा बन के छा जाये है
शबे-यास में कौन छुप कर नदीममेरे हाल पर मुसकुरा जाये है
महब्बत में ऐ मौत ऐ ‍‍ज़ि‍न्दगीमरा जाये है या जिया जाये है
पलक पर पसे-तर्के-ग़म गाहगाहसितारा कोई झिलमिला जाये है
तेरी याद शबहा-ए-बे-ख्‍़वाब मेंसितारों की दुनिया बसा जाये है
जो बे-ख्‍़वाब रक्खे है ता ज़ि‍न्दगीवही ग़म किसी दिन सुला जाये है
न सुन मुझसे हमदम मेरा हाल-ज़ारदिले-नातवाँ सनसना जाये है
ग़ज़ल मेरी खींचे है ग़म की शराबपिये है वो जिससे पिया जाये है
मेरी शाइरी जो है जाने-नशातग़मों के ख़ज़ाने लुटा जाये है
मुझे छोड़ कर जाये है तेरी यादकि जीने का एक आसरा जाय है
मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़तेरे घर को हर रास्ता जाये है
सुनायें तुम्हें दास्ताने-'फ़ि‍राक़'मगर कब किसी से सुना जाये है
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