ग़ज़ल

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
अब कहाँ रस्म घर लुटाने कीबर्कतें थी शराबख़ाने की
कौन है जिससे गुफ़्तुगु कीजेजान देने की दिल लगाने की
बात छेड़ी तो उठ गई महफ़िलउनसे जो बात थी बताने की
साज़ उठाया तो थम गया ग़म-ए-दिलरह गई आरज़ू सुनाने की
चाँद फिर आज भी नहीं निकलाकितनी हसरत थी उनके आने की
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