ग़ज़ल
आज यूँ मौज-दर-मौज
आज यूँ मौज-दर-मौज ग़म थम गयाइस तरह ग़मज़दों को क़रार आ गयाजैसे खु़शबू-ए-जु़ल्फ़-ए-बहार आ गयीजैसे पैग़ाम-ए-दीदार-ए-यार आ गया
जिसकी दीदो-तलब वहम समझे थे हमरू-ब-रू फिर से सरे-रहगुज़र आ गएसुबह-ए-फ़र्दा को फिर दिल तरसने लगाउम्र-रफ़्तः तेरा ऐतबार आ गया
रुत बदलने लगी रंजे-दिल देखनारंगे-गुलशन से अब हाल खुलता नहींज़ख़्म छलका कोई या गुल खिलाअश्क उमड़े कि अब्र-ए-बहार आ गया
खू़न-ए-उश्शाक़ से जाम भरने लगेदिल सुलगने लगे, दाग़ जलने लगेमहफ़िल-ए-दर्द फिर रंग पर आ गयीफिर शब-ए-आरज़ू पर निखार आ गया
सरफरोशी के अंदाज़ बदलते गएदावत-ए-क़त्ल पर मक़्ताल-ए-शहर मेंडालकर कोई गर्दन में तौक़ आ गयालादकर कोई काँधे पे दार आ गया
'फ़ैज़' क्या जानिए यार किस आस परमुन्तज़िर हैं कि लाएगा कोई ख़बरमयकशों पर हुआ मुहतसिब मेहरबानदिलफ़िगारों पे क़ातिल को प्यार आ गया
==शब्दार्थ ==
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh