ग़ज़ल

कब याद में तेरा साथ नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हात नहींसद शुक्र केः अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं
मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ, दिल बेच आयें जाँ दे आयेंदिल वालो कूचः-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं
जिस धज से कोई मक़तल में गया वो शान सलामत रहती हैये जान तो आनी जानी है, इस जाँ की तो कोई बात नहीं
मैदाने-वफ़ा दरबार नहीं, याँ नामो-नसब की पूछ कहाँआशिक़ तो किसी का नाम नहीं, कुछ इ'श्क़ किसी की ज़ात नहीं
गर बाज़ी इ'श्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसागर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
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