ग़ज़ल
क़र्ज़े-निगाहे-यार
क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हमसब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम
कुछ इम्तहान-ए-दस्त-ए-जफ़ा कर चुके हैं हमकुछ उनकी दस्तरस का पता कर चुके हैं हम
अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रहीक़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम
देखें है कौन-कौन, ज़रूरत नहीं रहीकू-ए-सितम में सबको ख़फ़ा कर चुके हैं हम
अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलेंरहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम
उनकी नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंगजितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम
कुछ अपने दिल की ख़ू का भी शुक्रान चाहियेसौ बार उनकी ख़ू का गिला कर चुके हैं हम
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