ग़ज़ल
ख़ुर्शीद-ए-महशर की लौ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तोदूर कितने हैं ख़ुशियाँ मनाने के दिनखुल के हँसने के दिन गीत गाने के दिनप्यार करने के दिन दिल लगाने के दिन
आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तोज़ख़्म कितने अभी बख़्त-ए-बिस्मिल में हैंदश्त कितने अभी राह-ए-मंज़िल में हैंतीर कितने अभी दस्त-ए-क़ातिल में हैं
आज के दिन ज़ुबूँ है मेरे दोस्तोआज के दिन तो यूँ है मेरे दोस्तोजैसे दर्द-ओ-अलम के पुराने निशाँसब चले सू-ए-दिल कारवाँ कारवाँहाथ सीने पे रखो तो हर उस्तख़्वाँसे उठे नाला-ए-अल'अमाँ अल'अमाँ
आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तोकब तुम्हारे लहू के दरीदा अलमफ़र्क़-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर पे होंगे रक़मअज़ कराँ ता कराँ कब तुम्हारे क़दमलेके उठेगा वो बहर-ए-ख़ूँ यम-ब-यमजिस दिल में धुल जायेगा आज के दिन का ग़मसारे दर्द-ओ-अलम सारे जौर-ए-सितमदूर कितनी है ख़ुर्शीद-ए-महशर की लौआज के दिन न पूछो मेरे दोस्तो
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