ग़ज़ल

ख़ुदा वो वक़्त न लाये

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि सोग़वार हो तूसुकूँ की नींद तुझे भी हराम हो जायेतेरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जायेतेरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाये
ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेराहुजूम्-ए-यास से बेताब होके रह जायेवफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब हो के रह जायेतेरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाये
ग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरातवील रातों में तू भी क़रार को तरसेतेरी निगाह् किसी ग़मगुसार को तरसेख़िज़ाँरसीदा तमन्ना बहार को तरसे
कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्ताँ पे झुकेकि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करेफ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे अएतमाद् करेख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये
वो दिल जो तेरे लिये बे-क़रार अब भी हैवो आँख जिस को तेरा इन्तज़ार अब भी है
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