ग़ज़ल
क्या करें - मेरी तेरी निगाह में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मेरी तेरी निगाह में जो लाख इंतज़ार हैंजो मेरे तेरे तन-बदन में लाख दिल फ़िग़ार हैंजो मेरी तेरी उंगलियों की बेहिसी से सब क़लम नज़ार हैंजो मेरे तेरे शहर की हर इक गली मेंमेरे तेरे नक़्श-ए-पाअ के बे-निशाँ मज़ार हैंजो मेरी तेरी रात के सितारे ज़ख़्म ज़ख़्म हैंजो मेरी तेरी सुबह के गुलाब चाक चाक हैंये ज़ख़्म सारे बे-दवा ये चाक सारे बे-रफ़ूकिसी पे राख चाँद की किसी पे ओस का लहूये हैं भी या नहीं बताये है कि महज़ जाल हैमेरे तुम्हारे अंकबूत-ए-वहम का बुना हुआजो है तो इस का क्या करेंनहीं है तो भी क्या करेंबता, बता, बता, बता
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