ग़ज़ल

कहीं तो कारवान-ए-दर्द की मंज़िल ठहर जाये

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
कहीं तो कारवाँ-ए-दर्द की मंज़िल ठहर जाएकिनारे आ लगे उम्र-ए-रवाँ या दिल ठहर जाए
अमाँ कैसी कि मौज-ए-ख़ूँ अभी सर से नहीं गुज़रीगुज़र जाए तो शायद बाज़ू-ए-क़ातिल ठहर जाए
कोई दम बादबाँ-ए-कश्ती-ए-सहबा को तह रखोज़रा ठहरो ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-महफ़िल ठहर जाए
हमारी ख़मोशी बस दिल से लब तक एक वक़्फ़ा हैये तूफ़ाँ है जो पल भर बस लब-ए-साहिल ठहर जाए
निगाह-ए-मुंतज़िर कब तक करेगी आईनाबंदीकहीं तो दश्त-ए-ग़म में यार का महमिल ठहर जाए
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