ग़ज़ल
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ सेजिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा थाजिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमनेदहर को दहर का अफ़साना बना रखा था
आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन परउसकी मदहोश जवानी ने इनायत की हैकारवाँ गुज़रे हैं जिनसे इसी र’अनाई केजिसकी इन आँखों ने बेसूद इबादत की है
तुझ से खेली हैं वह महबूब हवाएँ जिनमेंउसके मलबूस की अफ़सुर्दा महक बाक़ी हैतुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेहताब का नूरजिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है
तू ने देखी है वह पेशानी वह रुख़सार वह होंठज़िन्दगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हमनेतुझ पे उठी हैं वह खोई-खोई साहिर आँखेंतुझको मालूम है क्यों उम्र गँवा दी हमने
हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त केइतने एहसान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूँहमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा हैजुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखीयास-ओ-हिर्मां के दुख-दर्द के म’आनी सीखेज़ेर द्स्तों के मसाएब को समझना सीखासर्द आहों के, रुख़े ज़र्द के म’आनी सीखे
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिनकेअश्क आंखों में बिलकते हुए सो जाते हैंनातवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाबबाज़ू तौले हुए मंडराते हुए आते हैं
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्तशाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता हैआग-सी सीने में रह-रह के उबलती है न पूछअपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है
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