ग़ज़ल

कई बार इसका दामन

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम सेमगर दिल है कि उसकी खाना-वीरानी नहीं जाती
कई बार इसकी खातिर ज़र्रे-ज़र्रे का जिगर चीरामगर ये चश्म-ए-हैरां, जिसकी हैरानी नहीं जाती
नहीं जाती मताए-लाला-ओ-गौहर की गरांयाबीमताए-ग़ैरत-ओ-ईमां की अरज़ानी नहीं जाती
मेरी चश्म-ए-तन आसां को बसीरत मिल गयी जब सेबहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती
सरे-ख़ुसरव से नाज़-ए-कज़कुलाही छिन भी जाता हैकुलाह-ए-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती
ब-जुज़ दीवानगी वां और चारा ही कहो क्या हैजहां अक़्ल-ओ-खिरद की एक भी मानी नहीं जाती
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh