ग़ज़ल

कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे सेवो आज़माइश सी दिल-ओ-नज़र की, वो क़ुरबतें सी वो फ़ासले से
कभी आरज़ू के सेहरा में आके रुकते हैं क़ाफ़िले सेवो सारी बातें लगाव की सी वो सारे उनवाँ विसाल के से
निगह-ओ-दिल को क़रार कैसा निशात-ओ-ग़म में कमी कहाँ कीवो जब मिले हैं तो उन से हर बार की है उल्फ़त नये सिरे से
बहुत गिराँ है ये ऐश-ए-तन्हा कहीं सबुकतर कहीं गवारावो दर्द्-ए-पिन्हाँ कि सारी दुनिया रफ़ीक़ थी जिसके वास्ते से
तुम्हीं कहो रिंद-ओ-मुहतसिब में हो आज शब कौन फ़र्क़ ऐसाये आके बैठे हैं मैकदे में वो उठके आये हैं मैकदे से
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