ग़ज़ल

अपने ज़िम्मे है तेरा क़र्ज़ ना जाने कब से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
तुम न आये थे तो हर चीज़ वही थी कि जो हैआसमां हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मयऔर अब शीशा-ए-मय, राह-गुज़र, रंग-ए-फ़लकरंग है दिल का मेरे "ख़ून-ए-जिगर होने तक"चम्पई रंग कभी, राहत-ए-दीदार का रंगसुरमई रंग के है सा'अत-ए-बेज़ार का रंगज़र्द पत्तों का, ख़स-ओ-ख़ार का रंगसुर्ख़ फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंगज़हर का रंग, लहू-रंग, शब-ए-तार का रंग
आसमां, राह-गुज़र, शीशा-ए-मयकोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रगकोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना हैअब जो आये हो तो ठहरो के कोई रंग, कोई रुत, कोई शयएक जगह पर ठहरे
फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो हैआसमां हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
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