ग़ज़ल

आये कुछ अब्र कुछ शराब आये

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
आए कुछ अब्र कुछ शराब आएउस के बाद आए जो अज़ाब आए
बाम-ए-मीना से माहताब उतरेदस्त-ए-साक़ी में आफ़ताब आए
हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चराग़ाँ होसामने फिर वो बेनक़ाब आए
उम्र के हर वरक़ पे दिल को नज़रतेरी मेहेर-ओ-वफ़ा के बाब आए
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाबआज तुम याद बेहिसाब आए
न गई तेरे ग़म की सरदारीदिल में यूँ रोज़ इन्क़लाब आए
जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बामजब भी हम ख़ानाख़राब आए
इस तरह अपनी ख़ामोशी गूँजीगोया हर सिम्त से जवाब आए
'फ़ैज़' थी राह सर बसर मंज़िलहम जहाँ पहुँचे कामयाब आए
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