ग़ज़ल
कोई आशिक किसी महबूबा से
याद की राहगुज़र जिसपे इसी सूरत सेमुद्दतें बीत गयीं हैं तुम्हें चलते-चलतेखत्म हो जाय जो दो-चार कदम और चलोमोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी काजिसके आगे न कोई मैं हूँ, न कोई तुम हो
साँस थामें हैं निग़ाहें, कि न जाने किस दमतुम पलट आओ, गुज़र जाओ, या मुड़ के देखोगरचे वाकिफ़ हैं निगाहें, के ये सब धोखा हैगर कहीं तुमसे हम-आग़ोश हुई फिर से नज़रफूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़रफिर इसी तरह जहां होगा मुकाबिल पैहमसाया-ए-ज़ुल्फ़ का और ज़ुंबिश-ए-बाजू का सफ़र
दूसरी बात भी झूठी है, कि दिल जानता हैयहाँ कोई मोड़, कोई दश्त, कोई राह नहींजिसके परदे में मेरा माह-ए-रवां डूब सकेतुमसे चलती रहे ये राह, यूँ ही अच्छा हैतुमने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं!
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