ग़ज़ल

एक रहगुज़र पर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
वो जिसकी दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँवो हुस्न जिसकी तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ
हज़ार फित्ने तहे-पा-ए-नाज़ ख़ाकनशींहर एक निगाह ख़मारे-शबाब से रंगीं
शबाब, जिससे तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसेंविक़ार जिसकी रक़ाबत को शोख़ियाँ तरसें
अदा-ए-लग़्ज़िशे-पा पर क़यामतें क़ुर्बांबयाज़े-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां
सियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्तः नकहतों तो हुजूमतवील रातों की ख़्वाबीदः राहतों का हुजूम
वो आँख जिसके बना’व पे ख़ालिक इतरायेज़बाने-शे’र को तारीफ़ करते शर्म आये
वो होंठ फ़ैज़ से जिनके बहारे-लालःफरोशबहिश्त-ओ-कौसर-ओ-तसनीम-ओ-सलसबील ब-दोश
गुदाज़-जिस्म, क़बा जिस पे सज के नाज़ करेदराज़ क़द जिसे सर्वे-सही नमाज़ करे
ग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहींवो हुस्न जिसका तस्सवुर बशर का काम नहीं
किसी ज़माने में इस रहगुज़र से गुज़रा थाब-सद-ग़ुरूरो-तजम्मुल इधर से गुज़रा था
और अब ये राहगुज़र भी है दिलफरेब-ओ-हसींहै इसकी ख़ाक मे कैफ़-ए-शराब-ओ-शे’र मकीं
हवा मे शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैंफ़ज़ा मे नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैं
गरज़ वो हुस्न अब इस जा का ज़ुज़्वे-मंज़र हैनियाज़-ए-इश्क़ को इक सिज्दःगह मयस्सर है
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh