ग़ज़ल
अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोला
अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोलामैंने भी सुना है अब जाएगा तेरा डोला
इन राहों के पत्थर भी मानूस थे पाँवों सेपर मैंने पुकारा तो कोई भी नहीं बोला
लगता है ख़ुदाई में कुछ तेरा दख़ल भी हैइस बार फ़िज़ाओं ने वो रंग नहीं घोला
आख़िर तो अँधेरे की जागीर नहीं हूँ मैंइस राख में पिन्हा है अब भी वही शोला
सोचा कि तू सोचेगी, तूने किसी शायर कीदस्तक तो सुनी थी पर दरवाज़ा नहीं खोला
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