ग़ज़ल
अनुभव-दान
"खँडहरों सी भावशून्य आँखेंनभ से किसी नियंता की बाट जोहती हैं।बीमार बच्चों से सपने उचाट हैं;टूटी हुई जिंदगीआँगन में दीवार से पीठ लगाए खड़ी है;कटी हुई पतंगों से हम सबछत की मुँडेरों पर पड़े हैं।"
बस! बस!! बहुत सुन लिया है।नया नहीं है ये सब मैंने भी किया है।अब वे दिन चले गए,बालबुद्धि के वे कच्चे दिन भले गए।आज हँसी आती है!
व्यक्ति को आँखों मेंक़ैद कर लेने की आदत पर,रूप को बाहों में भर लेने की कल्पना पर,हँसने-रोने की बातों पर,पिछली बातों पर,आज हँसी आती है!
तुम सबकी ऐसी बातें सुनने पररुई के तकियों में सिर धुनने पर,अपने हृदयों को भग्न घोषित कर देने की आदत पर,गीतों से कापियाँ भर देने की आदत पर,आज हँसी आती है!
इस सबसे दर्द अगर मिटतातो रुई का भाव तेज हो जाता।तकियों के गिलाफ़ों को कपड़े नहीं मिलते।भग्न हृदयों की दवा दर्जी सिलते।गीतों से गलियाँ ठस जातीं।
लेकिन,कहाँ वह उदासी अभी मिट पाई!गलियों में सूनापन अब भी पहरा देता है,पर अभी वह घड़ी कहाँ आई!
चाँद को देखकर काँपोतारों से घबराओभला कहीं यूँ भी दर्द घटता है!मन की कमज़ोरी में बहकरखड़े खड़े गिर जाओखुली हवा में न आओभला कहीं यूँ भी पथ कटता है!
झुकी हुई पीठ,टूटी हुई बाहों वाले बालक-बालिकाओं सुनो!खुली हवा में खेलो।चाँद को चमकने दो, हँसने दोदेखो तोज्योति के धब्बों को मिलाती हुईरेखा आ रही है,कलियों में नए नए रंग खिल रहे हैं,भौरों ने नए गीत छेड़े हैं,आग बाग-बागीचे, गलियाँ खूबसूरत हैं।उठो तुम भीहँसी की क़ीमत पहचानोहवाएँ निराश न लौटें।
उदास बालक बालिकाओं सुनो!समय के सामने सीना तानो,झुकी हुई पीठटूटी हुई बाहों वाले बालकों आओमेरी बात मानो।
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