ग़ज़ल
देश
संस्कारों की अरगनी पर टंगाएक फटा हुआ बुरकाकितना प्यारा नाम है उसका-देश,जो मुझको गंधऔर अर्थऔर कविता का कोई भीशब्द नहीं देतासिर्फ़ एक वहशत,एक आशंकाऔर पागलपन के साथ,पौरुष पर डाल दिया जाता है,ढंकने को पेट, पीठ, छाती और माथा।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh