ग़ज़ल
बिरहणि कौं सिंगार न भावै
बिरहणिकौं सिंगार न भावै।है कोइ ऐसा राम मिलावै॥टेक॥
बिसरे अंजन-मंजन, चीरा।बिरह-बिथा यह ब्यापै पीरा॥१॥
नौ-सत थाके सकल सिंगारा।है कोइ पीड़ मिटावनहारा॥२॥
देह-गेह नहिं सुद्धि सरीरा।निसदिन चितवत चातक नीरा॥३॥
दादू ताहि न भावत आना।राम बिना भई मृतक समाना॥४॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.