ग़ज़ल
घीव दूध में रमि रह्या
घीव दूध में रमि रह्या व्यापक सब हीं ठौरदादू बकता बहुत है मथि काढै ते औरयह मसीत यह देहरा सतगुरु दिया दिखाईभीतर सेवा बन्दगी बाहिर कहे जाईदादू देख दयाल को सकल रहा भरपूररोम-रोम में रमि रह्या तू जनि जाने दूरकेते पारखि पचि मुए कीमति कही न जाईदादू सब हैरान हैं गूँगे का गुड़ खाईजब मन लागे राम सों तब अनत काहे को जाईदादू पाणी लूण ज्यों ऐसे रहे समाई
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