ग़ज़ल
अजहूँ न निकसे प्रान कठोर
अजहूँ न निकसे प्रान कठोर .दरसन बिना बहुत दिन बीते सुंदर प्रीतम मोर.चारि पहर चारों जुग बीते रैनि गंवाई भोर .अवधि गई अजहूँ नहिं आए कतहुँ रहे चितचोर.कबहूँ नैन निरखि नहिं देखे मारग चितवत तोर.दादू ऐसे आतुर बिरहिनि जैसे चन्द चकोर.
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