ग़ज़ल
तब हम एक भये रे भाई
तब हम एक भये रे भाई।मोहन मिल साँची मति आई॥टेक॥
पारस परस भये सुखदाई।तब दूनिया दुरमत दूरि गमाई॥१॥
मलयागिरि मरम मिल पाया॥तब बंस बरण-कुल भरग गँवाया॥२॥
हरिजल नीर निकट जब आया।तब बूँद-बूँद मिल सहज समाया॥३॥
नाना भेद भरम सब भागा।तब दादू एक रंगै रँग लागा॥४॥
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